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सर्वांगीण विकास और अधिकार

मनुष्य और समाज के हर पहलू को व्यापक समझ के साथ देखकर ही वास्तविक विकास संभव है। इसलिए संवैधानिक, मनोवैज्ञानिक और मौलिक अ…

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सर्वव्यापी संज्ञान से नवसृजन की ओर

यदि व्यक्ति समाज और जीवन के सभी पक्षों को व्यापक दृष्टि से समझते हुए निरंतर गतिशील रहना चाहता है, तो उसे केवल अपनी सीमित…

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संज्ञान से व्यवस्था-सुधार की ओर

समाज में उठने वाले प्रश्न यदि केवल विरोध का कारण न बनकर चिंतन और संवाद का आधार बनें, तो वे व्यवस्था को बेहतर बनाने की शक…

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जाल जी का जंजाल और चैतन्य हल

जब कोई व्यवस्था अपने ही बनाए हुए जाल में फंस जाती है ,तब उसे एक नई दृष्टि, नई सोच और नए तरीके की जरुरत होती है उस जाल से…

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शिक्षा: अधिकार या समझौता?

आज शिक्षा की गुणवत्ता पर सबको गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। शिक्षा केवल एक ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिसमें ब…

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अंधविश्वास नहीं, समझ बढ़ाएँ

माँ से जुड़ी चीज़ों को महत्व देने के बावजूद, बेटे से जुड़ी किसी समस्या या कमी का कारण पिता या ‘पितृदोष’ को मान लेना उचित…

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सत्य की स्वयं जाँच

किसी बात को मानने या समझाने से पहले उसकी सच्चाई स्वयं जाँचें…

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सही ज्ञान, गलत दिशा

सही ज्ञान होने के बाद भी गलत रास्ता चुनना, स्वयं अपने जीवन को अंधकार में धकेलना है…

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मानने से पहले जानो

सिर्फ किसी गुरु, धर्म या परंपरा को आँख बंद करके मानने के बजाय सत्य को समझें, स्वयं विचार करें और व्यापक ज्ञान के आधार पर…

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स्वयं की क्षमता की पहचान

हर व्यक्ति के भीतर अपनी क्षमताओं और संभावनाओं को पहचानने की क्षमता होती है। आवश्यकता है स्वयं को समझने, अपनी योग्यता को …

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आत्मपरीक्षण का दर्पण

मनुष्य को अपनी कमियों, खूबियों और वास्तविक व्यक्तित्व को समझने के लिए आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। जब हम स्वयं का ईमानदारी स…

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चेतना का प्रकाश

सच्ची चेतना व्यक्ति को भ्रम में फँसने के बजाय समय की समस्याओं को समझने, सही निर्णय लेने और अपनी सोच को विकसित करने की शक…

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